‘नेपाल से हिंदू राजशाही उखाड़ने का राजीव गॉंधी ने बनाया प्लान, माओवादियों से की थी मिन्नतें’: अमर भूषण ,पूर्व डायरेक्टर,रॉ

​नरेश बीरेंद्र देव और महारानी एश्वर्या के साथ राजीव व सोनिया गॉंधी (फाइल फोटो)

हिन्दू राष्ट्र रहे नेपाल की राजशाही को उखाड़ फेंकने में राजीव गाँधी के सरकार की अहम भूमिका थी। भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ ने 1990 में नेपाल में एक गुप्त ऑपरेशन की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य पड़ोसी राष्ट्र में राजशाही को हटा कर लोकतंत्र की स्थापना करना था। रॉ के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर अमर भूषण ने अपनी पुस्तक ‘इनसाइड नेपाल’ में लिखा है कि रॉ ने इस बात की पूरी कोशिश की थी कि नेपाल में अराजक तत्व राजशाही-विरोधी अभियान का फ़ायदा नहीं उठाएँ।

जनता ने राजतंत्र की अधिकारों में कटौती करने एवं लोकतंत्र की स्थापना के लिए बड़ा अभियान चलाया था। राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली सरकार चाहती थी कि भारत इस कार्य में नेपाल की जनता का सहयोग करे। रॉ ने नेपाल के सभी राजनीतिक दलों व संगठनों के बीच एकता बनाए रखने के लिए मेहनत की। गुप्त ऑपरेशन के लिए रॉ के ईस्टर्न ब्यूरो के चीफ के रूप में भूषण ने भी अपना नाम जीवनाथन रख लिया था। इसी नाम से उन्होंने कई बहुत से लोगों को राजशाही के ख़िलाफ़ अभियान के लिए प्रशिक्षित किया

नेपाल के राजा बीरेंद्र वीर विक्रम शाह देव पर कोई दबाव काम नहीं कर रहा था। इसके लिए भारत सरकार ने कूटनीतिक तरीके भी अपनाए लेकिन सब बेकार। इसके बाद भारत सरकार ने नेपाल में खाद्य पदार्थों की सप्लाई रोने का निर्णय लिया, ताकि राजा पर दबाव डाल कर जनता के प्रति जिम्मेदार बनाने के प्रयासों को बल मिले। नेपाल के राजा मदद के लिए चीन तक पहुँच गए थे। भारत कभी नहीं चाहता था कि पड़ोसी देशों में साम्राज्यवादी चीन का प्रभाव मजबूत हो।

नेपाल के राजा बीरेंद्र वीर विक्रम शाह देव पर कोई दबाव काम नहीं कर रहा था। इसके लिए भारत सरकार ने कूटनीतिक तरीके भी अपनाए लेकिन सब बेकार। इसके बाद भारत सरकार ने नेपाल में खाद्य पदार्थों की सप्लाई रोने का निर्णय लिया, ताकि राजा पर दबाव डाल कर जनता के प्रति जिम्मेदार बनाने के प्रयासों को बल मिले। नेपाल के राजा मदद के लिए चीन तक पहुँच गए थे। भारत कभी नहीं चाहता था कि पड़ोसी देशों में साम्राज्यवादी चीन का प्रभाव मजबूत हो।

इसके बाद भारत सरकार ने रॉ प्रमुख एके वर्मा को यह कार्य सौंपा। उन्होंने अपने सबसे विश्वस्त अधिकारी जीवनाथन को यह दायित्व दिया। इसके बाद जीवनाथन नेपाल में राजशाही के पर कतर कर लोकतंत्र की स्थापना का प्रयासों में जुट गए। जीवनाथन ने सरकार को भरोसा दिलाया कि जो काम कूटनीतिज्ञ और राजनयिक न कर सके, वह कार्य रॉ कर दिखाएगी। इससे पहले रॉ की ईस्टर्न यूनिट को कभी महत्व नहीं मिला था।

रॉ ने माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड को लुभाने के लिए सारी ताक़तें लगा दीं ताकि वह राजशाही के ख़िलाफ़ लड़ाई में बाकी राजनीतिक दलों का साथ दें। प्रचंड आगे चल कर 2 बार (अगस्त 2016 – जून 2017, अगस्त 2008 – मई 2009) नेपाल के प्रधानमंत्री भी बने। कई बैठकों के उपरांत रॉ प्रचंड को मनाने में कामयाब हुआ था, क्योंकि वह छिप कर रहते थे और उन तक पहुँचना मुश्किल होता था। इस प्रक्रिया में महीनों लग गए।

जीवनाथन के साथ हुई एक बैठक में प्रचंड ने सवाल भी पूछा था कि नेपाल राजशाही के अंतर्गत रहे या फिर लोकतंत्र के, इससे भारत को आख़िर क्या मतलब है? खैर, ऑपरेशन ख़त्म होते ही जीवनाथन गायब हो गए। उन्होंने अपने अंतर्गत कार्य कर रहे लोगों से साफ़ कह दिया कि वे ऐसा समझें कि कोई जीवनाथन था ही नहीं। नेपाल के कई नेता जीवनाथन को खोजते हुए भटक रहे थे लेकिन जीवनाथन तो कोई था ही नहीं।

Source: OPIndia

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