आजाद भारत का पहला नरसंहार, 5000 ब्राह्मणों का नरसंहार

 

 

यह बात कम लोगो को ही पता होगी कि आजादी के बाद भारत में पहला नरसंहार ब्राह्मणों का हुआ था। दरअसल 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। जैसे ही पता चला कि महात्मा गांधी की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे चितपावन ब्राह्मण है, बंबई (आज की मुंबई) और महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में भयानक कत्लेआम मचा दिया गया। गांधी की मौत का बदला लेने के लिए कई चितपावन ब्राह्मण मौत के घाट उतार दिए गए। चितपावन मूलत: कोंकण के ब्राह्मण होते हैं, जिनकी मुंबई और महाराष्ट्र के कुछ दूसरे इलाकों में अच्छी-खासी आबादी थी। महादेव रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले, लोकमान्य तिलक और वीर सावरकर जैसी मशहूर हस्तियां इसी समुदाय से आती हैं। ये पूरा हत्याकांड तबके महाराष्ट्र के कांग्रेसी नेताओं की देखरेख में हुआ था, जो खुद को अहिंसावादी और गांधीवादी बताते हैं। इसके बाद बेहद प्रायोजित तरीके से लोगों के बीच यह बात फैलाई गई कि चितपावन लोग ब्राह्मण होते ही नहीं हैं। दरअसल वो इज़राइल से आए यहूदी हैं, जो भारत में पहचान बदलकर रह रहे हैं। कांग्रेसी दुष्प्रचार का नतीजा था कि बहुत सारे लोगों ने इस पर यकीन भी कर लिया।

 

5000 ब्राह्मणों का नरसंहार!

उस दौर के लोगों के दावों के अनुसार मुंबई, पुणे, सातारा, कोल्हापुर, सांगली, अहमदनगर, सोलापुर और कराड जैसे इलाकों में 1000 से 5000 चितपावन ब्राह्मणों को बर्बर तरीके से मौत के घाट उतार दिया गया। कुछ जगहों पर यह संख्या 8000 होने का भी दावा किया जाता है। मरने वालों में कई महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। इस कत्लेआम में 20 हजार के करीब मकान और दुकानें जला दी गईं। इसके शिकार हुए लोगों में मशहूर क्रांतिकारी वीर सावरकर के तीसरे भाई नारायण दामोदर सावरकर भी थे। गांधी के अहिंसक चेलों ने ईंट-पत्थरों से हमला करके नारायण सावरकर को मौत के घाट उतार दिया था। पुणे यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे अरविंद कोल्हटकर ने लिखा है कि “तब मैं पांच साल का था। हम सातारा में रहा करते थे। जहां पर हमारा घर था वहां ज्यादातर गैर-ब्राह्मण लोग ही रहा करते थे। यहां लोगों के बीच बहुत भाई-चारा था, लेकिन उस हिंसा में हमारा परिवार भी बुरी तरह से शिकार बना। 1 फरवरी 1948 की दोपहर को हमारा घर और प्रिंटिंग प्रेस जला दिया गया।” जाहिर है ये हिंसा किसी गुस्से का नतीजा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी कार्रवाई थी, जिसके पीछे कांग्रेस को चुनौती देने वाली एक जाति को पूरी तरह से खत्म कर देने का इरादा था। यही कारण है कि लोगों के कारोबार और संस्थानों को निशाना बनाया गया। धनी लोगों के व्यापारिक संस्थान जला दिए गए।

 

दिल्ली से मिली थी हरी-झंडी

उस दौर के कई लोग उस घटना को याद करते हुए कहते हैं कि ऐसा लगता था मानो इस हत्याकांड के लिए इशारा दिल्ली से किया गया हो। महाराष्ट्र का नेतृत्व पूरी तरह पंगु था और सड़कों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का आतंक छाया हुआ था। उन्होंने लोगों की सिर्फ हत्याएं और मकान जलाने का काम ही नहीं किया, सैकड़ों औरतों के साथ बलात्कार की भी घटनाएं हुईं। बच्चों को अनाथ करके सड़क पर फेंक दिया गया। कई लोगों को रास्तों में, होटलों में नाम पूछ-पूछकर मारा गया। कई चितपावन परिवारों के घरों के दरवाजे बाहर से बंद करके आग लगा दी गई। कहते हैं कि 1 फरवरी 1948 के दिन ब्राह्मणों की आहुति से पूरा पुणे शहर जल रहा था। यह हत्याकांड 3 फरवरी तक जारी रहा था। इसके बाद जाकर पुलिस की मदद पहुंचनी शुरू हुई। घर-बार छोड़कर भागे ब्राह्मणों में दहशत इतनी थी कि कई लोग 5-6 महीने तक अपने घरों में नहीं लौटे।

 

इतिहास से नरसंहार मिटा दिया

सबसे बड़ी बात कि इस पूरे नरसंहार की चर्चा न तो इतिहास की किताबों में कहीं मिलती है और न ही मीडिया रिपोर्ट्स में। तब मीडिया वही छापता था जो कांग्रेस के नेता चाहते थे। ज्यादातर अखबारों के मालिक कांग्रेस के नेता हुआ करते थे। नतीजा हुआ कि यह पूरी घटना सिर्फ कही-सुनी बातों तक सिमट कर रह गई। धीरे-धीरे ये बातें बताने वाले भी खत्म होते गए और आजाद देश के इस सबसे बड़े नरसंहार की कहानी करीब-करीब भुला दी गई। वैसे भी आजादी की खुशी में किसी को महाराष्ट्र के इन ब्राह्मणों की पीड़ा की कोई परवाह नहीं थी। हालांकि कुछ विदेशी अखबारों ने इस घटना की खबरें छापी थीं। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने गांधी की हत्या की खबर के साथ ही बांबे में बड़े पैमाने पर ब्राह्मणों को कत्ल किए जाने की जानकारी दी थी। उसमें यह भी बताया गया था कि हमलावर कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता हैं। तब के विदेशी अखबारों की खबरें आप इसी पेज पर नीचे देख सकते हैं।

 

 

गोडसे ने गांधी को मारा क्यों था?

अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि गोडसे ने आखिर गांधी को ही क्यों मारा? उसकी नाराजगी थी तो वो जिन्ना या नेहरू को भी मार सकता था। दरअसल इस बात को समझने के लिए उस दौर के हालात को जानना जरूरी है। ये वो समय था जब पाकिस्तान बंटवारे के साथ-साथ भारत से आर्थिक मुआवजा भी मांग रहा था। इस पर महात्मा गांधी काफी हद तक सहमत हो गए थे। इसके अलावा पाकिस्तान से लेकर पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) तक एक गलियारा देने की भी बात हो रही थी। हैदराबाद स्टेट ने तब भारत में विलय से इनकार कर दिया था। गांधी उसे भारत में मिलाने के लिए किसी भी तरह के बल-प्रयोग के खिलाफ थे। गांधी के निधन के बाद ही बल्लभभाई पटेल ने ‘ऑपरेशन पोलो’ करवा के हैदराबाद का भारत में विलय कराया था।

 

 

गोडसे की फांसी में हुई जल्दीबाजी

नाथूराम गोडसे को 15 नवंबर 1949 को उनके साथी नारायण दत्तात्रेय आप्टे के साथ अंबाला जेल में फाँसी दे दी गई। उन्हें ये सजा बहुत जल्दबाजी में दी गई, क्योंकि नेहरू सरकार को डर था कि अगर गोडसे को सजा के खिलाफ अपील का मौका मिला तो वो छूट भी सकता है। दरअसल जिस दिन फांसी दी गई, उसके 71 दिन बाद देश की सुप्रीम कोर्ट बनी थी। आजादी के समय सुप्रीम कोर्ट नहीं थी। 21 जून 1949 को पंजाब की हाईकोर्ट ने दोनों की मौत की सज़ा पर मुहर लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट की जगह उन दिनों प्रिवी कौंसिल हुआ करती थी। प्रिवी कौंसिल ने गोडसे और आप्टे की अपील न सुनने का फ़ैसला लिया। प्रिवी कौंसिल का तर्क था कि उसकी मियाद 26 जनवरी, 1950 तक ख़त्म हो जाने वाली है। इतने कम वक़्त में अपील पर फ़ैसला नहीं हो सकता था, इसलिये प्रिवी कौंसिल ने अपील नहीं सुनी। 71 दिन बाद सुप्रीम कोर्ट का गठन होना था। गोडसे और आप्टे को सुप्रीम कोर्ट में अपील का मौक़ा देने के लिये 71 दिन का इंतजार करना सरकार को मंजूर नहीं था। इसलिये सुप्रीम कोर्ट में अपील के बिना गोडसे और आप्टे को फांसी पर लटका दिया गया।

 

 

 

Source :- newsloose.com

 

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