कैलाश कुंड यात्रा शुरू, वासुकी कुंड में लोग लगाएंगे डुबकी, राजा भूपत पाल से है बड़ा कनेक्शन -रवि थापा

भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष सप्तमी से वार्षिक कैलाश वासुकी कुंड की यात्रा का आगाज होगा। हालांकि प्रशासन की ओर से औपचारिक तौर पर यह यात्रा 26 अगस्त से शुरू होगी और इसी के साथ छत्रगलां और बेहाली के रास्ते कैलाश कुंड तक भक्तों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। आस्था के सरोवर में डुबकी लगाने के लिए रोजाना सैकड़ों भक्त दुर्गम पहाड़ों पर मीलों पैदल सफर कर वहां पहुंचते हैं। भक्त सर्पराज भगवान वासुकीनाग को समर्पित इस यात्रा में हर साल चंबा, कठुआ, उधमपुर, डोडा व जम्मू के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों से हजारों भक्त कैलाश कुंड यात्रा में भाग लेते हैं। कैलाश कुंड (कपलाश) को वासुकी कुंड भी कहा जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार यह कुंड नागराज वासुकी का वास है।
समुद्र तल से 14500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस शीतल और स्वच्छ जल के बड़े कुंड में पवित्र स्नान के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। श्रावण पूर्णिमा के 14वें दिन शुरू होने वाली यात्रा में विभिन्न यात्रा रूट से आने वाले भक्त भजन-कीर्तन व जय घोष के साथ ढक्कू की सुन्दर धुन पर नृत्य करते हुए पहुंचते हैं। मुख्य यात्रा भद्रवाह के गाठा से शुरू होती है, जहां भगवान वासुकी नाग का प्राचीन मंदिर है और लोग इसे कुलदेव के रूप में पूजते हैं। बनी के डुग्गन का वासुकी नाग मंदिर पनियालग के वासुकी नाग मंदिर से करीब चार दशक पहले बनाया गया माना जाता है।
राजा भूपत पाल ने नाम दिया ‘वासक छल्ला’
इतिहासकारों की मानें तो 1629 में बसोहली के राजा भूपत पाल ने भद्रवाह पर कब्जा कर लिया। बसोहली और भद्रवाह के बीच से छत्रगलां से होकर बनी के पनियालग से होकर रास्ता गुजरता था। वासुकी नाग मंदिर पनियालग को लेकर एक लोक कथा के अनुसार भद्रवाह की ओर जाते समय राजा भूपत पाल ने कैलाश कुंड का रास्ता अपनाया। यहां नागराज वासुकी नाग की मौजूदगी से अनभिज्ञ राजा ने हवा से भरी एक बक की चपड़ी से बने बैग के सहारे कुंड को पार करने की कोशिश की। जैसे ही राजा कुंड के बीचोंबीच पहुंचे उन्हें एक विशाल नाग कुंड के भीतर दिखाई दिया और राजा से पूरी तरह से लिपट गया।
राजा ने नागराज के सामने अपनी गलती को मानते हुए नतमस्तक हुआ और कहा कि वह कुंड को पार नहीं करेगा। वचन देने के साथ ही राजा ने नागराज को अपने कान के छल्ले चढ़ाए और यह भी कहा कि वह बसोहली में मंदिर का निर्माण भी करवाएगा, जहां लोग भगवान विष्णु के अवतार वासुकी नाग की पूजा कर सकेंगे। वापसी पर चिंतित राजा यह सोच रहा था कि आखिर मंदिर का निर्माण कैसे किया जाए और मूर्तियां कहां से आएंगी। इसी बीच उन्हें जानकारी मिली कि अशपति पर्वत के नजदीक भद्रवाह के पीछे वासुकी नाग का एक मंदिर है, जहां उत्कृष्ट नक्काशी से जिमुत वाहन और वासुकी नाग को दर्शाया गया है।
राजा ने तुरंत आदेश दिया कि बसोहली के लिए वैसी ही मूर्तियां बनवाई जाएं। राजा छत्रगलां की ओर से लौट रहा था, तब उसे प्यास लगी। उसने एक झरने से पानी पीने के लिए हाथ बढ़ाया और महसूस किया कि उसके हाथ में आकर कुछ रुक गया है। झरने से उसने वहीं कान के छल्ले पाए जो राजा ने कैलाश कुंड में चढ़ाए थे। राजा को अपना वचन याद आ गया और उसने कैलाश कुंड को वासक छल्ला का नाम भी दिया। स्थानीय लोग आज भी इसे वासक छल्ला के नाम से जानते हैं।
और फिर पनियालग में हुई वासुकी नाग मंदिर की स्थापना
राजा भूपत पाल के निर्देश के बाद कुछ ही महीने में शिल्पकारों ने वासुकी नाग की मूर्तियां तैयार कर लीं। जिसके बाद राजा ने इन मूर्तियों को बसोहली लाने के निर्देश दिए। कारीगरों ने मूर्तियों को एक पालकी में रखा और बसोहली की ओर बढ़ने लगे। लोआंग को पार कर कारीगर पनियालग पहुंचे। पनियालग स्थानीय भाषा में पानी के नजदीक कहा जाता है। कारीगरों ने अंधेरा ढलता देख यहीं रात गुजारने की ठानी। सुबह जब पालकी को उठाने की कोशिश की गई तो पालकी उठ नहीं पा रही थी। सभी यत्न बेकार हो गए, जिसके बाद वासुकी नाग के मंदिर पुजारी को पनियालग बुलाया गया। पुजारी ने अनुष्ठान के बाद राजा को बताया कि वासुकी नाग बसोहली नहीं जाना चाहते। ऐसे में पनियालग में ही मंदिर का निर्माण करवाया जाए और मूर्तियां यहीं स्थापित की जाएं। राजा ने मंदिर के लिए भूमि उपलब्ध करवाई और तब से यहां भगवान वासुकी नाग की पूजा जारी है।
कैलाश कुंड यात्रा
’26 अगस्त से वासुकी नाग, कैलाश कुंड यात्रा शुरू होने जा रही है। यात्रा रूट पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए प्रशासन की ओर से सभी प्रबंध सुनिश्चित किए गए हैं। मेडिकल कैंप लगाए जाने के साथ ग्रेफ को मार्ग सुचारू रखने के भी निर्देश दिए गए हैं। बताया कि अबतक यात्रा रूट पर लंगर लगाने के लिए तीन लंगर कमेटियों ने प्रशासन से अनुमति भी हासिल की है।
Source : World Hindu News

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